Wednesday, January 26, 2022

100 DAYS READING CAMPAIGN

b>Union Education Minister Dharmendra Pradhan has launched a 100-day Reading Campaign ‘Padhe Bharat’ to improve learning levels of students, according to officials. “Children studying in Balvatika to class 8 will be part of this campaign. The reading campaign will be organised for 100 days (14 weeks) starting from January 1 to April 10, 2022. The reading campaign aims to have the participation of all stakeholders at national and state level including children, teachers, parents, community, educational administrators etc
OBJECTIVES OF 100 DAYS READING CAMPAIGN # To achieve sustainable development goel effective communication and involved learners # To promote reading habit among students right from balvatika # To make childrens independent readers and life long learners # To utilise libraries at an optimum extentTarget Group: Children studying in Balvatika to Grade VIII will be part of this campaign. They will further be categorised in three groups class wise: TARGET GROUP Group I Balvatika to Grade II Group II Grade III to Grade V Group III Grade VI to Grade VIII

Monday, January 24, 2022

नेताजी सुभाष् चंद्र बोस जीवनी

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को उड़ीसा में कटक के एक संपन्न बंगाली परिवार में हुआ था। बोस के पिता का नाम 'जानकीनाथ बोस' और माँ का नाम 'प्रभावती' था। जानकीनाथ बोस कटक शहर के मशहूर वक़ील थे। प्रभावती और जानकीनाथ बोस की कुल मिलाकर 14 संतानें थी, जिसमें 6 बेटियाँ और 8 बेटे थे। सुभाष चंद्र उनकी नौवीं संतान और पाँचवें बेटे थे। अपने सभी भाइयों में से सुभाष को सबसे अधिक लगाव शरदचंद्र से था।
आरम्भिक जीवन : नेताजी ने अपनी प्रारंभिक पढ़ाई कटक के रेवेंशॉव कॉलेजिएट स्कूल में हुई। तत्पश्चात् उनकी शिक्षा कलकत्ता के प्रेज़िडेंसी कॉलेज और स्कॉटिश चर्च कॉलेज से हुई, और बाद में भारतीय प्रशासनिक सेवा (इण्डियन सिविल सर्विस) की तैयारी के लिए उनके माता-पिता ने बोस को इंग्लैंड के केंब्रिज विश्वविद्यालय भेज दिया। अँग्रेज़ी शासन काल में भारतीयों के लिए सिविल सर्विस में जाना बहुत कठिन था किंतु उन्होंने सिविल सर्विस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया। कटक के प्रोटेस्टेण्ट यूरोपियन स्कूल से प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर 1909 में उन्होंने रेवेनशा कॉलेजियेट स्कूल में दाखिला लिया। कॉलेज के प्रिन्सिपल बेनीमाधव दास के
व्यक्तित्व का सुभाष के मन पर अच्छा प्रभाव पड़ा। मात्र पन्द्रह वर्ष की आयु में सुभाष ने विवेकानन्द साहित्य का पूर्ण अध्ययन कर लिया था। 1915 में उन्होंने इण्टरमीडियेट की परीक्षा बीमार होने के बावजूद द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1916 में जब वे दर्शनशास्त्र (ऑनर्स) में बीए के छात्र थे किसी बात पर प्रेसीडेंसी कॉलेज के अध्यापकों और छात्रों के बीच झगड़ा हो गया सुभाष ने छात्रों का नेतृत्व सम्हाला जिसके कारण उन्हें प्रेसीडेंसी कॉलेज से एक साल के लिये निकाल दिया गया और परीक्षा देने पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया। 49वीं बंगाल रेजीमेण्ट में भर्ती के लिये उन्होंने परीक्षा दी किन्तु आँखें खराब होने के कारण उन्हें सेना के लिये अयोग्य घोषित कर दिया गया। किसी प्रकार स्कॉटिश चर्च कॉलेज में उन्होंने प्रवेश तो ले लिया किन्तु मन सेना में ही जाने को कह रहा था। खाली समय का उपयोग करने के लिये उन्होंने टेरीटोरियल आर्मी की परीक्षा दी और फोर्ट विलियम सेनालय में रँगरूट के रूप में प्रवेश पा गये। फिर ख्याल आया कि कहीं इण्टरमीडियेट की तरह बीए में भी कम नम्बर न आ जायें सुभाष ने खूब मन लगाकर पढ़ाई की और 1919 में बीए (ऑनर्स) की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। कलकत्ता विश्वविद्यालय में उनका दूसरा स्थान था। पिता की इच्छा थी कि सुभाष आईसीएस बनें किन्तु उनकी आयु को देखते हुए केवल एक ही बार में यह परीक्षा पास करनी थी। उन्होंने पिता से चौबीस घण्टे का समय यह सोचने के लिये माँगा ताकि वे परीक्षा देने या न देने पर कोई अन्तिम निर्णय ले सकें। सारी रात इसी असमंजस में वह जागते रहे कि क्या किया जाये। आखिर उन्होंने परीक्षा देने का फैसला किया और 15 सितम्बर 1919 को इंग्लैण्ड चले गये। परीक्षा की तैयारी के लिये लन्दन के किसी स्कूल में दाखिला न मिलने पर सुभाष ने किसी तरह किट्स विलियम हाल में मानसिक एवं नैतिक विज्ञान की ट्राइपास (ऑनर्स) की परीक्षा का अध्ययन करने हेतु उन्हें प्रवेश मिल गया। इससे उनके रहने व खाने की समस्या हल हो गयी। हाल में एडमीशन लेना तो बहाना था असली मकसद तो आईसीएस में पास होकर दिखाना था। सो उन्होंने 1920 में वरीयता सूची में चौथा स्थान प्राप्त करते हुए पास कर ली। राजनीतिक जीवन : आजाद हिंद फौज की स्थापना - द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान, सितम्बर 1939, को सुभाष चन्द्र बोस ने यह तय किया कि वो एक जन आंदोलन आरंभ करेंगे। वो पुरे भारत में लोगों को इस आन्दोलन के लिए प्रोत्साहन करने लगे और लोगों को जोड़ना भी शुरू किया। इस आन्दोलन की शुरुवात की भनक लगते ही ब्रिटिश सरकार को सहन नहीं हुआ और उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस को जेल में डाल दिया। उन्होंने जेल में 2 हफ़्तों तक खाना तक नहीं खाया। खाना ना खाने के कारण जब उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा तो हंगामे के डर से उन्हें घर में नज़रबंद कर के रखा गया।
साल 1941 में, उनके इस House-arrest के दौरान सुभाष ने जेल से भागने की एक योजना बनाई। वो पहले गोमोह, बिहार गए और वहां से वो सीधा पेशावर(जो की अब पाकिस्तान का हिस्सा है) चले गए। उसके बाद वो जर्मनी चले गए और वहां हिटलर(Hitler) से मिले। सुभाष चन्द्र बोस बर्लिन में अपनी पत्नी एमिली शेंकल Emilie Schenkl के साथ रहते थे। 1943 में बोस ने दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी आर्मी को तैयार किया जिका नाम उन्होंने इंडियन नेशनल आर्मी (आजाद हिंद फौज) रखा। नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्वकालिक नेता थे, जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी. वह ऐसे वीर सैनिक थे, इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा. उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है, जिसका वह हक़दार है. सुभाष चंद्र बोस स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे। नेताजी भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक थे, जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।उनमें नेतृत्व के चमत्कारिक गुण थे, जिनके बल पर उन्होंने आज़ाद हिंद फ़ौज की कमान संभाल कर अंग्रेज़ों को भारत से निकाल बाहर करने के लिए एक मज़बूत सशस्त्र प्रतिरोध खड़ा करने में सफलता हासिल की थी। नेताजी के जीवन से यह भी सीखने को मिलता है कि हम देश सेवा से ही जन्मदायिनी मिट्टी का कर्ज़ उतार सकते हैं। उन्होंने अपने परिवार के बारे में न सोचकर पूरे देश के बारे में सोचा। नेताजी के जीवन के कई और पहलू हमे एक नई ऊर्जा प्रदान करते हैं। वे एक सफल संगठनकर्ता थे। उनकी बोलने की शैली में जादू था और उन्होंने देश से बाहर रहकर ‘स्वतंत्रता आंदोलन’ चलाया। नेताजी मतभेद होने के बावज़ूद भी अपने साथियो का मान सम्मान रखते थे। उनकी व्यापक सोच आज की राजनीति के लिए भी सोचनीय विषय है। तुम मुझे खून दो मैं तुम्हे आज़ादी दूंगा ! मित्रों ! बारह महीने पहले “ पूर्ण संग्रहण ”(total mobilization) या “परम बलिदान ”(maximum sacrifice) का एक नया कार्यक्रम पूर्वी एशिया में मौजूद भारतीयों के समक्ष रखा गया था. आज मैं आपको पिछले वर्ष की उपलब्धियों का लेखा -जोखा दूंगा और आपके सामने आने वाले वर्ष के लिए हमारी मांगें रखूँगा. लेकिन ये बताने से पहले, मैं चाहता हूँ कि आप इस बात को समझें कि एक बार फिर हमारे सामने स्वतंत्रता हांसिल करने का स्वर्णिम अवसर है.अंग्रेज एक विश्वव्यापी संघर्ष में लगे हुए हैं और इस संघर्ष के दौरान उन्हें कई मोर्चों पर बार बार हार का सामना करना पड़ा है. इस प्रकार दुश्मन बहुत हद्द तक कमजोर हो गया है, स्वतंत्रता के लिए हमारी लड़ाई आज से पांच साल पहले की तुलना में काफी आसान हो गयी है. इश्वर द्वारा दिया गया ऐसा दुर्लभ अवसर सदी में एक बार आता है.इसीलिए हमने प्रण लिया है की हम इस अवसर का पूर्ण उपयोग अपनी मात्र भूमि को अंग्रेजी दासता से मुक्त करने के लिए करेंगे. मैं हमारे इस संघर्ष के परिणाम को लेकर बिलकुल आशवस्थ हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ पूर्वी एशिया में मौजूद 30 लाख भारतीयों के प्रयत्नों पर निर्भर नहीं हूँ. भारत के अन्दर भी एक विशाल आन्दोलन चल रहा है और हमारे करोडो देशवासी स्वतंत्रता पाने के लिए कष्ट सहने और बलिदान देने को तैयार हैं। मैं हमारे इस संघर्ष के परिणाम को लेकर बिलकुल आशवस्थ हूँ, क्योंकि मैं सिर्फ पूर्वी एशिया में मौजूद 30 लाख भारतीयों के प्रयत्नों पर निर्भर नहीं हूँ। भारत के अन्दर भी एक विशाल आन्दोलन चल रहा है और हमारे करोडो देशवासी स्वतंत्रता पाने के लिए कष्ट सहने और बलिदान देने को तैयार हैं। सुभाष चंद्र बोस के रहस्य पर किताब लिख चुके मिशन नेताजी के अनुज धर का कहना है कि भारत सरकार सब कुछ जानती है, लेकिन वह जान-बूझकर रहस्य से पर्दा नहीं उठाना चाहती। उन्होंने कहा कि इसीलिए सरकार ने सूचना के अधिकार के तहत दायर उनके आवेदन पर नेताजी से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने से इनकार कर दिया। नेताजी के बारे में जानने के लिए जितनी भी जांच हुईं, उन सबमें कुछ न कुछ ऐसा आया, जिससे कहानी और उलझती चली गई। विचार : 1. तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा| 2. याद रखिये – सबसे बड़ा अपराध, अन्याय को सहना और गलत व्यक्ति के साथ समझौता करना हैं| 3. यह हमारा फर्ज हैं कि हम अपनी आजादी की कीमत अपने खून से चुकाएं| हमें अपने त्याग और बलिदान से जो आजादी मिले, उसकी रक्षा करनी की ताकत हमारे अन्दर होनी चाहिए| 4. मेरा अनुभव हैं कि हमेशा आशा की कोई न कोई किरण आती है, जो हमें जीवन से दूर भटकने नहीं देती| 5. जो अपनी ताकत पर भरोसा करता हैं, वो आगे बढ़ता है और उधार की ताकत वाले घायल हो जाते हैं| 6. हमारा सफर कितना ही भयानक, कष्टदायी और बदतर हो सकता हैं लेकिन हमें आगे बढ़ते रहना ही हैं| सफलता का दिन दूर हो सकता हैं, लेकिन उसका आना अनिवार्य ही हैं| नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय स्वाधीनता संग्राम के उन योद्धाओं में से एक हैं जिनका नाम और जीवन आज भी करोड़ों देशवासियों को मातृभमि के लिए समर्पित होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है|

Sunday, December 19, 2021

CELEBRATION OF NATIONAL LIBRARY WEEK


                                                              SLOGAN WRITING

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MASS READING

STORY WRITING

Monday, September 27, 2021

शहीद भगत सिंह की जयंती पर शत शत नमन





 भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है।

उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलाँ है जो पंजाब, भारत में है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह सिन्धु और माता का नाम श्रीमती विद्यावती जी था।

भगत सिंह जी ने बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार देखे थे, और उसी अत्याचार को देखते हुए उन्होने हम भारतीय लोगों के लिए इतना कर दिया की आज उनका नाम सुनहरे पन्नों में है। उनका कहना था कि देश के जवान देश के लिए कुछ भी कर सकते है, देश का हुलिया बदल सकते है और देश को आजाद भी करा सकते है। भगत जी का जीवन ही संघर्ष से परिपूर्ण था।भगत सिंह जी सिख थे और भगत सिंह जी के जन्म के समय उनके पिता सरदार किशन सिंह जी जेल में थे, भगत जी के घर का माहौल देश प्रेमी था, उनके चाचा जी श्री अजित सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी। उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे।

सन् 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह का खून खोल उठा और महात्मा गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आन्दोलन का उन्होंने पूरा साथ दिया। भगत सिंह जी अंग्रेजों को कभी भी ललकार दिया करते थे जैसे कि मानो वे अंग्रेजो को कभी भी लात मार कर भगा देते।

सन् 1926 मैं नौजवान भारत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया और इसके बाद सन् 1928 में उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को ज्वाइन किया। ये चन्द्रशेखर आजाद ने बनाया था और पूरी पार्टी ने जुट कर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आए। साइमन कमीशन का विरोध किया और उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे।साइमन वापस जाओ” का नारा लगाते हुए, वे लोग लाहौर रेलवे स्टेशन पर ही खड़े रहे, उनके इस आन्दोलन से उन पर लाठी चार्ज किये गए और लाठी चार्ज होने लगा।लाला जी बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मृत्यु भी हो गयी। उनकी मृत्यु से देश की आजादी के लिए हो रहे आन्दोलन में और भी तेजी आ गयी।

8 अप्रैल सन् 1929 को भगत जी ने अपने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की अस्सेम्बली में बम विस्फोट कर दिया उस बम से केवल आवाज ही होती थी और उसे केवल खाली स्थान पे फेका गया ताकि किसी को हानि न पहुंचे। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और पर्चे बाटें और इसके बाद दोनों ने अपने आप को गिरफ्तार करवा लिया। वे चाहते तो भाग सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।

भगत सिंह जी ने ऐसा करके भारत के लोगों और अंग्रेजों को दिखाया की एक हिन्दुस्तानी क्या क्या कर सकता है, भगत सिंह अपने आपको शहीद बताया करते थे और उनके देश प्रेम को देख कर ये साबित हुआ की वे एक क्रांतिकारी है और उनकी मृत्यु पर वे मरेंगे नहीं बल्कि शहीद होंगे।भगत सिंह राजगुरु सुखदेव पर मुकदमा चला और जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी, कोर्ट में भी उन तीनों ने इंक़लाब का नारा लगाया।


शहीद भगत सिंह को फांसी कब दी गयी थी?

भगत सिंह की मृत्यु 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी लेकिन देश के लोगों ने उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन किये थे जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को डर लगा की अगर भगत जी को आजाद कर दिया तो वे ब्रिटिश सरकार को जिंदा नहीं छोड़ेंगे इसलिए 23 मार्च 1931 को शाम 7 बज कर 33 मिनट पर जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उनसे पूछा गया की उनकी आखिरी इच्छा क्या है तो भगत सिंह जी ने कहा की मुझे किताब पूरी कर लेने दीजिए।

कहा जाता है कि उन्हें जेल के अधिकारियों ने बताया की उनकी फांसी दी जानी है अभी के अभी तो भगत जी ने कहा की “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – “ठीक है अब चलो”

मरने का डर बिल्कुल उनके मुख पे नहीं था डरने के वजह वे तीनों ख़ुशी से मस्ती में गाना गा रहे थे।

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, माय रँग दे बसन्ती चोला…

24 मार्च 1931को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दे दी गयी। 

भगत सिंह द्वारा लिखी गयी किताब

“Why I am Atheist” सन् 1930 में शहीद भगत सिंह जी ने किताब लिखी.




Wednesday, September 8, 2021

INTERNATIONAL LITERACY DAY- 8TH SEPTEMBER

 

   THEME 2021 -   Literacy for a human-centered recovery: Narrowing the digital divide”.



Since 1967, International Literacy Day (ILD) celebrations have taken place annually around the world to remind the public of the importance of literacy as a matter of dignity and human rights, and to advance the literacy agenda towards a more literate and sustainable society. Despite progress made, literacy challenges persist with at least 773 million young people and adults lacking basic literacy skills today.

The COVID-19 crisis has disrupted the learning of children, young people and adults at an unprecedented scale. It has also magnified the pre-existing inequalities in access to meaningful literacy learning opportunities, dis-proportionally affecting 773 million non-literate young people and adults. Youth and adult literacy were absent in many initial national response plans, while numerous literacy programmes have been forced to halt their usual modes of operation.

Even in the times of global crisis, efforts have been made to find alternative ways to ensure the continuity of learning, including distance learning, often in combination with in-person learning.  Access to literacy learning opportunities, however, has not been evenly distributed. The rapid shift to distance learning also highlighted the persistent digital divide in terms of connectivity, infrastructure, and the ability to engage with technology, as well as disparities in other services such as access to electricity, which has limited learning options.   

The pandemic, however, was a reminder of the critical importance of literacy. Beyond its intrinsic importance as part of the right to education, literacy empowers individuals and improves their lives by expanding their capabilities to choose a kind of life they can value. It is also a driver for sustainable development. Literacy is an integral part of education and lifelong learning premised on humanism as defined by the Sustainable Development Goal 4. Literacy, therefore, is central to a human-centred recovery from the COVID-19 crisis.

ILD 2021 will explore how literacy can contribute to building a solid foundation for a human-centred recovery, with a special focus on the interplay of literacy and digital skills required by non-literate youth and adults. It will also explore what makes technology-enabled literacy learning inclusive and meaningful to leave no one behind. By doing so, ILD2021 will be an opportunity to reimagine future literacy teaching and learning, within and beyond the context of the pandemic.




Saturday, August 28, 2021

राष्ट्रीय खेल दिवस

  (मेजर ध्यान चंद जन्म दिवस)

   29 अगस्त 1905- 3 दिसम्बर 1979


भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाने वाले महान और कालजयी हॉकी खिलाड़ी, ध्यानचंद सिंह के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रपति भवन में भारत के राष्ट्रपति के द्वारा विभिन्न पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं, जिनमें राजीव गांधी खेल-रत्न पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रमुख हैं. इसके अलावा लगभग सभी भारतीय स्कूल और शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय खेल दिवस के दिन अपना सालाना खेल समारोह आयोजित करते हैं. पंजाब और चंडीगढ़ में यह दिन बहुत अधिक धूमधाम से मनाया जाता है.

मेजर ध्यानचंद सिंह का जीवन परिचय



मेजर ध्यान चंद सिंह का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद (उत्तर-प्रदेश) में हुआ था. चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार हॉकी स्टिक अपने हाथ में थामी थी. सोलह साल की आयु में वह आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुए और जल्द ही उन्हें हॉकी के अच्छे खिलाड़ियों का मार्गदर्शन प्राप्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप ध्यानचंद के कॅरियर को उचित दिशा मिलने लगी. आर्मी से संबंधित होने के कारण ध्यानचंद को मेजर ध्यानचंद के नाम से पहचान मिलने लगी.


वर्ष 1922 से लेकर 1926 के बीच मेजर ध्यानचंद केवल पंजाब रेजिमेंट और आर्मी हॉकी टूर्नामेंट में ही खेलते थे. वह न्यूजीलैंड दौरे पर जाने वाली आर्मी हॉकी टीम का हिस्सा बने. ध्यानचंद के अद्भुत कौशल और उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण भारतीय आर्मी हॉकी टीम एक मैच हारने और अठ्ठारह हॉकी मैचों में जीत दर्ज करने के बाद भारत लौटी. भारत वापसी के बाद ध्यानचंद को आर्मी में लांस नायक की उपाधि प्रदान की गई. इंडियन हॉकी फेडरेशन के गठन के बाद इसके सदस्यों ने पूरी कोशिश की कि वर्ष 1928 में एम्सटरडम में होने वाले ओलंपिक खेलों में अच्छे खिलाड़ियों के दल को भेजा जाए. इसीलिए वर्ष 1925 में उन्होंने एक इंटर-स्टेट हॉकी चैंपियनशिप की शुरुआत की जिसमें पांच राज्यों (संयुक्त प्रांत, बंगाल राजपुताना, पंजाब, केंद्रीय प्रांत) की टीमों ने भाग लिया. ध्यानचंद भी आर्मी हॉकी टीम की ओर से संयुक्त प्रांत की टीम में चयनित हुए.

पहली बार वह आर्मी से बाहर किसी हॉकी मैच का हिस्सा बन रहे थे. यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय कॅरियर की शुरुआत हुई. उन्होंने लगभग हर मैच में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी का खिताब जीता. अपने बेजोड़ और अद्भुत खेल के कारण उन्होंने लगातार तीन ओलंपिक खेलों, एम्स्टरडम ओलंपिक 1928, लॉस एंजिलस 1932, बर्लिन ओलंपिक 1936 (कैप्टैंसी), में टीम को तीन स्वर्ण पदक दिलवाए. ध्यानचंद ने ओलंपिक खेलों में 101 गोल और अंतरराष्ट्रीय खेलों में 300 गोल दाग कर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया है. एम्स्टरडम हॉकी ओलंपिक मैच में 28 गोल किए गए जिनमें से ग्यारह गोल अकेले ध्यानचंद ने ही किए थे. हॉकी के क्षेत्र में प्रतिष्ठित सेंटर-फॉरवर्ड खिलाड़ी ध्यानचंद ने 42 वर्ष की आयु तक हॉकी खेलने के बाद वर्ष 1948 में हॉकी से संन्यास ग्रहण कर लिया.


मेजर ध्यानचंद सिंह को वर्ष 1956 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. कैंसर जैसी लंबी बीमारी को झेलते हुए वर्ष 1979 में मेजर ध्यान चंद का देहांत हो गया. इनकी मृत्यु के बाद उनके जीवन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारत की राजधानी दिल्ली में उनके नाम से एक हॉकी स्टेडियम का उद्घाटन किया गया. इसके अलावा भारतीय डाक सेवा ने भी ध्यानचंद के नाम से डाक-टिकट चलाई.


मेजर ध्यानचंद के करीबी दोस्त और साथी खिलाड़ी उन्हें चंद कहकर पुकारते थे, जिसका अर्थ है अंधेरी रात में रोशनी बिखेरने वाला चांद. जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने भी ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर उन्हें जर्मन आर्मी में उच्च अधिकारी बनाने की पेशकश की लेकिन ध्यानचंद ने अपनी सभ्यता और नम्र व्यवहार का परिचय देते हुए इस ओहदे के लिए मना कर दिया. मेजर ध्यानचंद ने अपनी जीवनी और महत्वपूर्ण घटना वृतांत को अपने प्रशंसकों के लिए अपनी आत्मकथा गोल में सम्मिलित किए हैं. हॉकी में कॅरियर बनाने वाले युवाओं के लिए उनका जीवन और खेल दोनों ही एक मिसाल हैं. इस दिन युवाओं में खेलों के प्रति रुझान को बढ़ाने के लिए उन्हें प्रेरित भी किया जाता है.


Sunday, August 1, 2021

Celebration of National Reading Day, Week and Month 2021

 




    On 19/06/2021 students and teachers were taken online reading pledge and got e-certificates.


 

 


Slogan writing competitions on 20/062021-21/06/2021





Book Mark Design Competitions on 22/06/2021-23/06/2021



Book Review Writing on 24/06/2021-25/06/2021




Book Cover Design Competition on 26/6/2021-28/06/2021











Story Writing on 29/6/2021-30/6/2021




Story Telling on 01/07/2021


 




 



Online Quiz on Books and Authors 04/07/2021-05/07/2021



Book Exhibition on 07/07/2021





About the Author competition on 10/07/2021-12/07/2021



 

Student made home library/ reading corner on 13/07/2021-15/07/2021.










Online Book Exhibition  on 16/07/2021.




Created mobile library on link tree and share with the students.




Organized webinar on 18/07/2021 (Importance of reading)