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Monday, January 24, 2022
नेताजी सुभाष् चंद्र बोस जीवनी
Sunday, December 19, 2021
Monday, September 27, 2021
शहीद भगत सिंह की जयंती पर शत शत नमन

भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को लायलपुर ज़िले के बंगा में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है।
उनका पैतृक गांव खट्कड़ कलाँ है जो पंजाब, भारत में है। उनके पिता का नाम सरदार किशन सिंह सिन्धु और माता का नाम श्रीमती विद्यावती जी था।
भगत सिंह जी ने बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार देखे थे, और उसी अत्याचार को देखते हुए उन्होने हम भारतीय लोगों के लिए इतना कर दिया की आज उनका नाम सुनहरे पन्नों में है। उनका कहना था कि देश के जवान देश के लिए कुछ भी कर सकते है, देश का हुलिया बदल सकते है और देश को आजाद भी करा सकते है। भगत जी का जीवन ही संघर्ष से परिपूर्ण था।भगत सिंह जी सिख थे और भगत सिंह जी के जन्म के समय उनके पिता सरदार किशन सिंह जी जेल में थे, भगत जी के घर का माहौल देश प्रेमी था, उनके चाचा जी श्री अजित सिंह जी स्वतंत्रता सेनानी थे और उन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी। उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे।
सन् 1919 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह का खून खोल उठा और महात्मा गांधी जी द्वारा चलाये गए असहयोग आन्दोलन का उन्होंने पूरा साथ दिया। भगत सिंह जी अंग्रेजों को कभी भी ललकार दिया करते थे जैसे कि मानो वे अंग्रेजो को कभी भी लात मार कर भगा देते।
सन् 1926 मैं नौजवान भारत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया और इसके बाद सन् 1928 में उन्होंने हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) को ज्वाइन किया। ये चन्द्रशेखर आजाद ने बनाया था और पूरी पार्टी ने जुट कर 30 अक्टूबर 1928 को भारत में आए। साइमन कमीशन का विरोध किया और उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे।“साइमन वापस जाओ” का नारा लगाते हुए, वे लोग लाहौर रेलवे स्टेशन पर ही खड़े रहे, उनके इस आन्दोलन से उन पर लाठी चार्ज किये गए और लाठी चार्ज होने लगा।लाला जी बुरी तरह घायल हो गए और उनकी मृत्यु भी हो गयी। उनकी मृत्यु से देश की आजादी के लिए हो रहे आन्दोलन में और भी तेजी आ गयी।
8 अप्रैल सन् 1929 को भगत जी ने अपने साथी क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की अस्सेम्बली में बम विस्फोट कर दिया उस बम से केवल आवाज ही होती थी और उसे केवल खाली स्थान पे फेका गया ताकि किसी को हानि न पहुंचे। उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और पर्चे बाटें और इसके बाद दोनों ने अपने आप को गिरफ्तार करवा लिया। वे चाहते तो भाग सकते थे मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।
भगत सिंह जी ने ऐसा करके भारत के लोगों और अंग्रेजों को दिखाया की एक हिन्दुस्तानी क्या क्या कर सकता है, भगत सिंह अपने आपको शहीद बताया करते थे और उनके देश प्रेम को देख कर ये साबित हुआ की वे एक क्रांतिकारी है और उनकी मृत्यु पर वे मरेंगे नहीं बल्कि शहीद होंगे।भगत सिंह राजगुरु सुखदेव पर मुकदमा चला और जिसके बाद उन्हें फांसी की सजा सुनाई गयी, कोर्ट में भी उन तीनों ने इंक़लाब का नारा लगाया।
शहीद भगत सिंह को फांसी कब दी गयी थी?
भगत सिंह की मृत्यु 24 मार्च 1931 को फांसी दी जानी थी लेकिन देश के लोगों ने उनकी रिहाई के लिए प्रदर्शन किये थे जिसके चलते ब्रिटिश सरकार को डर लगा की अगर भगत जी को आजाद कर दिया तो वे ब्रिटिश सरकार को जिंदा नहीं छोड़ेंगे इसलिए 23 मार्च 1931 को शाम 7 बज कर 33 मिनट पर जाने से पहले भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उनसे पूछा गया की उनकी आखिरी इच्छा क्या है तो भगत सिंह जी ने कहा की मुझे किताब पूरी कर लेने दीजिए।
कहा जाता है कि उन्हें जेल के अधिकारियों ने बताया की उनकी फांसी दी जानी है अभी के अभी तो भगत जी ने कहा की “ठहरिये! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – “ठीक है अब चलो”
मरने का डर बिल्कुल उनके मुख पे नहीं था डरने के वजह वे तीनों ख़ुशी से मस्ती में गाना गा रहे थे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रंग दे;
मेरा रँग दे बसन्ती चोला, माय रँग दे बसन्ती चोला…
24 मार्च 1931को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को फांसी दे दी गयी।
भगत सिंह द्वारा लिखी गयी किताब
“Why I am Atheist” सन् 1930 में शहीद भगत सिंह जी ने किताब लिखी.
Wednesday, September 8, 2021
INTERNATIONAL LITERACY DAY- 8TH SEPTEMBER
THEME 2021 - Literacy for a human-centered recovery: Narrowing the digital divide”.
The COVID-19 crisis has disrupted the learning of children, young people and adults at an unprecedented scale. It has also magnified the pre-existing inequalities in access to meaningful literacy learning opportunities, dis-proportionally affecting 773 million non-literate young people and adults. Youth and adult literacy were absent in many initial national response plans, while numerous literacy programmes have been forced to halt their usual modes of operation.
Even in the times of global crisis, efforts have been made to find alternative ways to ensure the continuity of learning, including distance learning, often in combination with in-person learning. Access to literacy learning opportunities, however, has not been evenly distributed. The rapid shift to distance learning also highlighted the persistent digital divide in terms of connectivity, infrastructure, and the ability to engage with technology, as well as disparities in other services such as access to electricity, which has limited learning options.
The pandemic, however, was a reminder of the critical importance of literacy. Beyond its intrinsic importance as part of the right to education, literacy empowers individuals and improves their lives by expanding their capabilities to choose a kind of life they can value. It is also a driver for sustainable development. Literacy is an integral part of education and lifelong learning premised on humanism as defined by the Sustainable Development Goal 4. Literacy, therefore, is central to a human-centred recovery from the COVID-19 crisis.
ILD 2021 will explore how literacy can contribute to building a solid foundation for a human-centred recovery, with a special focus on the interplay of literacy and digital skills required by non-literate youth and adults. It will also explore what makes technology-enabled literacy learning inclusive and meaningful to leave no one behind. By doing so, ILD2021 will be an opportunity to reimagine future literacy teaching and learning, within and beyond the context of the pandemic.
Saturday, August 28, 2021
राष्ट्रीय खेल दिवस
(मेजर ध्यान चंद जन्म दिवस)
29 अगस्त 1905- 3 दिसम्बर 1979
भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाने वाले महान और कालजयी हॉकी खिलाड़ी, ध्यानचंद सिंह के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए उनके जन्मदिन 29 अगस्त को हर वर्ष भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसी दिन उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को राष्ट्रपति भवन में भारत के राष्ट्रपति के द्वारा विभिन्न पुरस्कार प्रदान किए जाते हैं, जिनमें राजीव गांधी खेल-रत्न पुरस्कार, अर्जुन पुरस्कार और द्रोणाचार्य पुरस्कार प्रमुख हैं. इसके अलावा लगभग सभी भारतीय स्कूल और शिक्षण संस्थान राष्ट्रीय खेल दिवस के दिन अपना सालाना खेल समारोह आयोजित करते हैं. पंजाब और चंडीगढ़ में यह दिन बहुत अधिक धूमधाम से मनाया जाता है.
मेजर ध्यानचंद सिंह का जीवन परिचय
मेजर ध्यान चंद सिंह का जन्म 29 अगस्त 1905 को इलाहाबाद (उत्तर-प्रदेश) में हुआ था. चौदह वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार हॉकी स्टिक अपने हाथ में थामी थी. सोलह साल की आयु में वह आर्मी की पंजाब रेजिमेंट में शामिल हुए और जल्द ही उन्हें हॉकी के अच्छे खिलाड़ियों का मार्गदर्शन प्राप्त हो गया जिसके परिणामस्वरूप ध्यानचंद के कॅरियर को उचित दिशा मिलने लगी. आर्मी से संबंधित होने के कारण ध्यानचंद को मेजर ध्यानचंद के नाम से पहचान मिलने लगी.
वर्ष 1922 से लेकर 1926 के बीच मेजर ध्यानचंद केवल पंजाब रेजिमेंट और आर्मी हॉकी टूर्नामेंट में ही खेलते थे. वह न्यूजीलैंड दौरे पर जाने वाली आर्मी हॉकी टीम का हिस्सा बने. ध्यानचंद के अद्भुत कौशल और उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण भारतीय आर्मी हॉकी टीम एक मैच हारने और अठ्ठारह हॉकी मैचों में जीत दर्ज करने के बाद भारत लौटी. भारत वापसी के बाद ध्यानचंद को आर्मी में लांस नायक की उपाधि प्रदान की गई. इंडियन हॉकी फेडरेशन के गठन के बाद इसके सदस्यों ने पूरी कोशिश की कि वर्ष 1928 में एम्सटरडम में होने वाले ओलंपिक खेलों में अच्छे खिलाड़ियों के दल को भेजा जाए. इसीलिए वर्ष 1925 में उन्होंने एक इंटर-स्टेट हॉकी चैंपियनशिप की शुरुआत की जिसमें पांच राज्यों (संयुक्त प्रांत, बंगाल राजपुताना, पंजाब, केंद्रीय प्रांत) की टीमों ने भाग लिया. ध्यानचंद भी आर्मी हॉकी टीम की ओर से संयुक्त प्रांत की टीम में चयनित हुए.
पहली बार वह आर्मी से बाहर किसी हॉकी मैच का हिस्सा बन रहे थे. यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय कॅरियर की शुरुआत हुई. उन्होंने लगभग हर मैच में सर्वाधिक गोल करने वाले खिलाड़ी का खिताब जीता. अपने बेजोड़ और अद्भुत खेल के कारण उन्होंने लगातार तीन ओलंपिक खेलों, एम्स्टरडम ओलंपिक 1928, लॉस एंजिलस 1932, बर्लिन ओलंपिक 1936 (कैप्टैंसी), में टीम को तीन स्वर्ण पदक दिलवाए. ध्यानचंद ने ओलंपिक खेलों में 101 गोल और अंतरराष्ट्रीय खेलों में 300 गोल दाग कर एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया जिसे आज तक कोई तोड़ नहीं पाया है. एम्स्टरडम हॉकी ओलंपिक मैच में 28 गोल किए गए जिनमें से ग्यारह गोल अकेले ध्यानचंद ने ही किए थे. हॉकी के क्षेत्र में प्रतिष्ठित सेंटर-फॉरवर्ड खिलाड़ी ध्यानचंद ने 42 वर्ष की आयु तक हॉकी खेलने के बाद वर्ष 1948 में हॉकी से संन्यास ग्रहण कर लिया.
मेजर ध्यानचंद सिंह को वर्ष 1956 में भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. कैंसर जैसी लंबी बीमारी को झेलते हुए वर्ष 1979 में मेजर ध्यान चंद का देहांत हो गया. इनकी मृत्यु के बाद उनके जीवन के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए भारत की राजधानी दिल्ली में उनके नाम से एक हॉकी स्टेडियम का उद्घाटन किया गया. इसके अलावा भारतीय डाक सेवा ने भी ध्यानचंद के नाम से डाक-टिकट चलाई.
मेजर ध्यानचंद के करीबी दोस्त और साथी खिलाड़ी उन्हें चंद कहकर पुकारते थे, जिसका अर्थ है अंधेरी रात में रोशनी बिखेरने वाला चांद. जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने भी ध्यानचंद के खेल से प्रभावित होकर उन्हें जर्मन आर्मी में उच्च अधिकारी बनाने की पेशकश की लेकिन ध्यानचंद ने अपनी सभ्यता और नम्र व्यवहार का परिचय देते हुए इस ओहदे के लिए मना कर दिया. मेजर ध्यानचंद ने अपनी जीवनी और महत्वपूर्ण घटना वृतांत को अपने प्रशंसकों के लिए अपनी आत्मकथा गोल में सम्मिलित किए हैं. हॉकी में कॅरियर बनाने वाले युवाओं के लिए उनका जीवन और खेल दोनों ही एक मिसाल हैं. इस दिन युवाओं में खेलों के प्रति रुझान को बढ़ाने के लिए उन्हें प्रेरित भी किया जाता है.
Monday, August 23, 2021
Sunday, August 1, 2021
Celebration of National Reading Day, Week and Month 2021
On 19/06/2021 students and teachers were taken online reading pledge and got e-certificates.
Slogan writing competitions on 20/062021-21/06/2021
Book Mark Design Competitions on 22/06/2021-23/06/2021
Book Review Writing on 24/06/2021-25/06/2021
Book Cover Design Competition on 26/6/2021-28/06/2021
Story Writing on 29/6/2021-30/6/2021
Story Telling on 01/07/2021
Online Quiz on Books and Authors 04/07/2021-05/07/2021
Book Exhibition on 07/07/2021
About the Author competition on 10/07/2021-12/07/2021
Student made home library/ reading corner on 13/07/2021-15/07/2021.
Online Book Exhibition on 16/07/2021.
Created mobile library on link tree and share with the students.
Organized webinar on 18/07/2021 (Importance of reading)























